शिक्षा ऐसी शेरनी का दूध है जिसे पीकर इंसान हर फ़ील्ड में दहाड़ता है : चौधरी ज़ुबैर अहमद
देश के प्रति बाबा साहेब का योगदान अमिट और प्रेरणादायक है : डॉक्टर मुश्ताक़ अंसारी
नई दिल्ली, 6 दिसंबर। भारतीय लोकतंत्र के महान शिल्पी और संविधान निर्माता डॉ. भीमराव अंबेडकर के परिनिर्वाण दिवस पर आज राजधानी के न्यू सीलमपुर क्षेत्र में एक श्रद्धांजलि समारोह आयोजित किया गया। यह कार्यक्रम दिल्ली सरकार के अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति एवं अन्य पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग के सहयोग तथा फेस इस्लामिक कल्चर कम्युनिटी इंटीग्रेशन (फिक्की) के संयुक्त तत्वावधान में संपन्न हुआ। समारोह का नेतृत्व समिति के अध्यक्ष डॉ. मुश्ताक अंसारी ने किया।
समारोह की शुरुआत डॉ. अंबेडकर के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित कर हुई, जिसके बाद उपस्थित अतिथियों एवं समाजसेवियों ने संविधान निर्माण, सामाजिक समरसता, समानता और मानवाधिकारों की दिशा में बाबा साहेब के योगदान को स्मरण किया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में स्थानीय नागरिक भी उपस्थित रहे।
समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में क्षेत्रीय विधायक चौधरी ज़ुबैर अहमद मौजूद रहे। उनके साथ अनेक गणमान्य अतिथि उपस्थित रहे जिनमें फ़िक्की के सचिव सलीम अहमद, कोषाध्यक्ष शबाना अज़ीम, सैयद नासिर जावेद, मक़सूद जमाल, इश्त्याक अंसारी, रफ़ीक़ अहमद, राजेंद्र प्रधान, रियाज़ुद्दीन राजू, अपर्णा गहरवार, जरार अहमद, सचिन गौतम, हाजी लताफ़त अली, विजय पाठक, अफ़सर खान, मनमोहन गर्ग, दिलशाद सैफ़ी, जमी़ल मलिक, अन्नो बी, सोनी खान, रिज़वान इदरीसी, अरशद अंसारी, फ़ैज़ान कुरैशी, अली मुक़र्रम खान, आसिम हुसैन, अता उर रहमान, मोहम्मद आरिफ़, नदीम रईन सहित अन्य कई समाजसेवी और गणमान्य नागरिक शामिल रहे।
इस अवसर पर अपने संबोधन में विधायक चौधरी ज़ुबैर अहमद ने कहा कि शिक्षा एक ऐसी शेरनी का दूध है जिसे ग्रहण कर मनुष्य हर क्षेत्र में दहाड़ता है। बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर ने हमारे संविधान में सभी नागरिकों के सम्मान और अधिकारों को सुरक्षित रखा है। उनका जीवन संघर्ष हमें समानता, न्याय और शिक्षा की ओर अग्रसर होने की प्रेरणा देता है।
समिति के अध्यक्ष डॉ. मुश्ताक अंसारी ने कहा कि स्वतंत्रता संग्राम और संविधान निर्माण में बाबा साहेब का योगदान अमिट और प्रेरणादायक है। उन्होंने शिक्षा को मानव उत्थान का सर्वोत्तम साधन बताते हुए कहा कि डॉ. भीमराव अंबेडकर ने देश में ऊँच-नीच और जातिगत भेदभाव को समाप्त करने के लिए जीवनभर संघर्ष किया। उनकी दृष्टि सामाजिक न्याय और समान अवसरों पर आधारित भारत के निर्माण की थी। उनकी शिक्षाएँ आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं जितनी उनके समय में थीं।

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