अभिषेक वर्मा : बिज़नेस, पॉलिटिक्स और पब्लिक डिबेट के बीच एक चर्चित चेहरा!

 प्रो. जसीम मोहम्मद

अभिषेक वर्मा आज के समय के सबसे ज़्यादा चर्चित और बहसवाले  भारतीय पब्लिक फ़िगर में से एक हैं। 23 फरवरी सन् 1968 ई. को दिल्ली में जन्मे अभिषेक वर्मा  साहित्य और राजनीति से संबंधित पब्लिक लाइफ़ से लंबे जुड़े हुए लोगों के एक प्रसिद्ध परिवार से हैं। उनके पिता हिंदी के चर्चित और प्रसिद्ध  दिवंगत कवि श्रीकांत वर्मा  एक जाने-माने कवि और मेंबर ऑफ़ पार्लियामेंट, राज्यसभा थे। उनकी माँ श्रीमती वीणा वर्मा भी राज्यसभा की सदस्य रही थीं। इस वजह से, वे ऐसे माहौल में पले-बढ़े जहाँ पब्लिक सर्विस को बहुत सपोर्ट किया जाता था। अभिषेक वर्मा ने बहुत कम उम्र में ही बिज़नेस, पॉलिटिक्स और राष्ट्र के मामलों में गहरी दिलचस्पी दिखाई। उन्होंने अलग-अलग संगठनो में अलग-अलग लीडरशिप रोल निभाने के जोश, एम्बिशन और कॉन्फिडेंस के साथ कॉर्पोरेट दुनिया में कदम रखा। ‘एटलस इंटरैक्टिव इंडिया प्राइवेट लिमिटेड’  के चेयरमैन के तौर पर वे देश की कई शुरुआती टेक्नोलॉजिकल कोशिशों में शामिल थे; जैसे कि ‘भारत संचार निगम लिमिटेड’  (बीएसएनएल) के साथ एग्रीमेंट, जो ‘एडवांस्ड केबल टेलीविज़न’  के ज़रिए डिजिटल ब्रॉडकास्ट देने के नए तरीके लाने पर फ़ोकस करता था। एक समय था, जब भारत में इंटरनेट टीवी एक अनजान कॉन्सेप्ट था, ऐसी तरक्की से पता चलता था कि अभिषेक वर्मा को भविष्य के डेवलपमेंट की बहुत अच्छी समझ है।



हाल के वर्षों में, अभिषेक वर्मा अलग-अलग तरह के काम करनेवाले व्यक्ति बन गए हैं। उन्होंने ‘ओलियालिया वर्ल्ड’ नाम के एक इंटरनेशनल फास्ट-मूविंग कंज्यूमर गुड्स ऑर्गनाइज़ेशन के साथ अपना जुड़ाव शुरू किया, फिर विदेशों में बड़े पैमाने पर ‘इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट कॉन्सेप्ट’ पर काम करने लगे, जैसे कि मालदीव में एक प्रस्तावित इंटरनेशनल एयरपोर्ट प्रोजेक्ट। उन्होंने हमेशा स्वयं को हिम्मत से पेश करने की स्ट्रेटेजी बनाई है, चाहे वे किसी भी तरह की इंडस्ट्री से जुड़े हों। चाहे टेलीकम्युनिकेशन हो या कंज्यूमर गुड्स या इंफ्रास्ट्रक्चर, यह सदैव उनकी दिलचस्पी की इंडस्ट्री रही हो।



हाल ही में अभिषेक वर्मा राजनीति में कुछ ज़्यादा सम्मिलित रहे हैं। जनवरी 2025 में वह शिवसेना के चीफ नेशनल कोऑर्डिनेटर और महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में एनडीए  गठबंधन के लिए चुनाव समन्वयक बने। यह राजनीतिक विश्वास और रणनीतिक मूल्य का प्रदर्शन है। किसी भी क्षेत्रीय पार्टी की राष्ट्रीय पहुंच बढ़ाना कोई छोटा काम नहीं है।


अभिषेक वर्मा सार्वजनिक रूप से दक्षिणपंथी हिंदू राजनीतिक विचार से जुड़े हैं; वह धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों में शामिल होते हैं, जिन्हें वह सनातन मूल्यों के संरक्षण को बढ़ावा देते हैं। समर्थक इसे भ्रम के बजाय वैचारिक स्पष्टता के रूप में देखते हैं। धार्मिक नेताओं से मान्यता मिलने और श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र से जुड़े लोगों से आशीर्वाद मिलने से खास हित समूहों के बीच उनकी स्थिति और मजबूत हुई; “सनातन योद्धा” जैसे शीर्षक सांस्कृतिक समुदाय से प्रतीकात्मक समर्थन दिखाते हैं। प्रकृति में प्रतीकात्मक या आध्यात्मिक, इन इशारों का भारत के सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य में महत्व है। उन्होंने श्रीकांत वर्मा ट्रस्ट में मैनेजिंग ट्रस्टी पद से हिंदी साहित्य के सबसे बड़े निजी पुरस्कारों में से एक—श्रीकांत वर्मा सम्मान (जिसमें पत्रकारिता और ललित कला क्षेत्र के पुरस्कार सम्मिलित हैं)—की घोषणा की। लेखकों, कवियों, पत्रकारों और कलाकारों का समर्थन करके वह बौद्धिक और सांस्कृतिक विकास का समर्थन करने के लिए अपना समर्पण दिखाते हैं। एक सार्वजनिक व्यक्ति के रूप में उनकी यात्रा सार्वजनिक सेवा के माध्यम से प्रस्तुत चुनौतियों और अवसरों का उदाहरण है, क्योंकि उनके खिलाफ आरोप, मीडिया का ध्यान, चल रही कानूनी लड़ाइयाँ और राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता जैसी अनेक जटिलताएँ हैं। अभिषेक वर्मा की कहानी को और भी आकर्षक बनानेवाली बात यह है कि उन्होंने कई उतार-चढ़ावों के बावजूद लगातार खुद को निखारा है और नया रूप दिया है। कोर्टरूम से लेकर बोर्डरूम तक, पॉलिटिकल प्लेटफॉर्म और कल्चरल पहल तक, अभिषेक वर्मा हर जगह एक्टिव रहे हैं।


उन्हें पॉलिटिकल टारगेटिंग का शिकार माना जाता है। बावजूद इसके वे उस अनुभव से ज़्यादा मज़बूती के साथ बाहर आए हैं; हालाँकि, उन्हें उन लोगों की आलोचना का सामना करना पड़ता है, जो उन्हें मुख्य रूप से विवाद के नज़रिए से देखते हैं। दोनों ही मामलों में अभिषेक वर्मा का सफ़र महत्वाकांक्षा, नाकामी, संघर्ष और नए जन्म की एक दिलचस्प इंसानी कहानी दिखाता है, जो यह डेमोक्रेसी में पब्लिक करियर की मुश्किलों का एक उदाहरण है। वे एक ऐसे इंसान को दिखाते हैं, जिसने ज़िंदगी को खास अधिकार और दबाव, दोनों नज़रिए से देखा है और जो भारत में पब्लिक ज़िंदगी की अनिश्चितताओं से गुज़रा है — जहाँ पॉलिटिक्स, बिज़नेस, आइडियोलॉजी और मीडिया आपस में जुड़े हुए हैं। भले ही उनकी हिम्मत, स्ट्रेटेजिक समझ या कल्चरल कोशिशों के लिए कमिटमेंट के लिए तारीफ़ की गई हो, उनके अनुभव ज़िंदगी के कई पहलुओं के साथ-साथ पब्लिक ज़िंदगी में लोगों के विकास के बारे में एक ज़रूरी मैसेज देते हैं। अनेक विरोधों के बावजूद अभिषेक के व्यक्तित्व में ऐसा बहुत कुछ है, जो हमें प्रेरित ही नहीं करता, बल्कि उनके संघर्ष से कुछ न कुछ सीखने की हमें प्रेरणा मिलती है। 


(लेखक तुलनात्मक अध्ययन में प्रोफ़ेसर और सहारा न्यूज नेटवर्क के पूर्व समूह संपादक हैं। उनसे profjasimmd@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है)

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